केंद्र ने सीमावर्ती गांवों के व्यापक विकास के लिए इस कार्यक्रम के तहत अब तक देशभर में 19 जिलों के 46 विकासखंडों के 2967 गांवों की पहचान की है। कार्यक्रम के प्रथम चरण में 662 गांव लिए गए हैं। इसमें उत्तराखंड के 51 गांव भी शामिल हैं, जिनके चहुंमुखी विकास के लिए कार्ययोजना तैयार कर ली गई है।758 करोड़ रुपये की लागत से यहां के तीन जिलों पिथौरागढ़, चमोली व उत्तरकाशी के पांच विकासखंडों के इन गांवों के लिए विभिन्न क्षेत्रों में 510 कार्य प्रस्तावित किए गए हैं। अब केंद्र से बजट अवमुक्त होते ही इन कार्यों में तेजी आएगी और सीमावर्ती गांव जीवंत होंगे। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में देखें तो उसकी 658 किलोमीटर की सीमा चीन व नेपाल से सटी है। गांवों से निरंतर हो रहे पलायन से राज्य के ये सीमावर्ती गांव भी अछूते नहीं हैं।ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट पर ही गौर करें तो अब तक सीमावर्ती 26 गांव वीरान हुए हैं, जबकि अन्य गांवों में आबादी घटी है। ऐसे में चिंता अधिक बढ़ गई है। असल में सीमावर्ती गांवों के लोग सुरक्षा प्रहरी की भूमिका भी निभाते हैं। सीमा पर होने वाली किसी भी तरह की हलचल या गतिविधि की जानकारी उनके माध्यम से ही सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचती है।सरकार ने वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के तहत वहां की कार्ययोजना का खाका खींचा है। इन गांवों में रोड कनेक्टिविटी, पेयजल, सौर व पवन ऊर्जा सहित बिजली, मोबाइल व इंटरनेट कनेक्टिविटी, आजीविका विकास, पर्यटन विकास, बहुद्देश्यीय केंद्र, स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य कल्याण केंद्रों की स्थापना जैसे कार्य प्रस्तावित किए गए हैं। यही नहीं, आजीविका विकास के दृष्टिगत इन सीमावर्ती गांवों में उत्पादित उत्पादों की खरीद के लिए आइटीबीपी व सेना से अनुरोध किया जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि नए वर्ष में इन सीमावर्ती गांवों में इन कार्यों की शुरुआत होने पर ये जीवंत हो सकेंगे।

