देहरादून बीते एक दशक में तेजी से फैलते शहरीकरण का दबाव झेल रहा है। नई कालोनियों, अपार्टमेंट और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटान हुई है। पर्यावरणविद लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि विकास और हरियाली के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो दून की पहचान व जलवायु दोनों प्रभावित होंगी।अब भवन निर्माण और ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले मानचित्रों (नक्शे) में केवल प्रस्तावित निर्माण ही नहीं, बल्कि जमीन पर मौजूद हर पेड़, नाला, खाला, हाईटेंशन लाइन, रेलवे लाइन और अन्य संरचनाओं का भी पूरा ब्योरा अनिवार्य रूप से देना होगा।एमडीडीए की ओर से आर्किटेक्ट्स व ड्राफ्ट्समैन एसोसिएशन को जारी निर्देशों में साफ किया गया है कि भविष्य में किसी भी मानचित्र में स्थल की वास्तविक स्थिति छिपाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।एमडीडीए उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रस्तावित स्थल पर मौजूद पेड़ों की संख्या, उनकी प्रजाति और स्थिति का पूरा विवरण देना होगा। साथ ही ग्रुप हाउसिंग और बड़े प्रोजेक्ट्स में सड़क व पहुंच मार्ग के दोनों ओर पौधारोपण की योजना भी मानचित्र का हिस्सा बनेगी। प्राधिकरण ने भविष्य की परियोजनाओं में आवश्यकता अनुसार अतिरिक्त पौधारोपण का प्रस्ताव शामिल करने के भी निर्देश दिए हैं।
निरीक्षण में तथ्य छिपाने या गलत जानकारी मिलने पर संबंधित मानचित्र को तत्काल निरस्त कर दिया जाएगा। इतना ही नहीं, मानचित्र प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को प्राधिकरण में भविष्य के लिए अयोग्य भी घोषित किया जा सकता है। दरअसल, प्राधिकरण के संज्ञान में लगातार ऐसे मामले आ रहे थे, जिनमें नक्शों में ग्रीन एरिया तो दर्शाया जा रहा था, लेकिन मौके पर मौजूद पुराने और बड़े पेड़ों का उल्लेख नहीं किया जा रहा था। कई बार नाले, खाले और अन्य प्राकृतिक संरचनाओं को भी मानचित्रों से गायब कर दिया जाता था, जिससे निर्माण स्वीकृति मिलने के बाद पर्यावरणीय नुकसान की आशंका बढ़ जाती थी।प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि मानचित्र प्राप्त होने के बाद अधिकारी स्थल का निरीक्षण करेंगे। यदि निरीक्षण के दौरान मानचित्र और वास्तविक स्थिति में अंतर पाया गया तो संबंधित मानचित्र निरस्त कर दिया जाएगा। इसके अलावा जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई भी की जाएगी।
